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विदेशी सपनों का काला साया: ट्यूनीशिया में फंसे झारखंड के 48 मजदूर, भूखे-प्यासे घर लौटने की पुकार

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रिपोर्ट : आसिफ अंसारी

सारिया : गिरिडीह

सपनों के पीछे भागे इन मजदूरों की आहें आज भी गूंज रही हैं। बेहतर जीवन की चकाचौंध में फंसकर अफ्रीका के ट्यूनीशिया में भटक रहे झारखंड के 48 प्रवासी भाइयों का दर्द अब वीडियो संदेशों में उफान मार रहा है। तीन महीने से कंपनी ने मजूरी का एक नया नजरअंदाज कर दिया, खाने-पानी का संकट गहरा गया। “हम यहां मरने को जी रहे हैं… वेतन रोक दिया, पैसे खत्म, बस घर लौटना चाहते हैं!” – ये चीखें न सिर्फ दिल दहला रही हैं, बल्कि पूरे राज्य को झकझोर रही हैं। हजारीबाग, गिरिडीह और बोकारो के इन सपूतों का यह सिलसिला कब थमेगा?इन मजदूरों की आंखों में घर की मिट्टी की प्यास है, लेकिन जेब खाली और पेट भूखा। वीडियो में वे कांपते स्वरों में बता रहे हैं – “कंपनी ने धोखा दिया, अब न खाना, न दवा। सरकार बचाओ, हमें वापस लाओ!” यह कोई पहली घटना नहीं। छह महीने पहले साउथ अफ्रीका के नाइजर में बगोदर के संजय महतो, चंद्रिका महतो, राजू महतो, फलजीत महतो और मुंडरो के उत्तम महतो का अपहरण हो गया, आज तक उनका कोई सुराग नहीं। लालच में फंसे ये भाई अब क्यों बार-बार जाल में फंस रहे हैं? क्या राज्य में रोजगार की कमी ही इन्हें विदेश की ओर धकेल रही है? ‘प्रवासी श्रमिकों के दर्द पर सीना ताने चलने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सिकंदर अली ने केंद्र और राज्य सरकार से कूटनीतिक हस्तक्षेप की जोरदार मांग की है। “यह सिलसिला अब सहन से बाहर है! मजदूरों की सकुशल वतन वापसी सुनिश्चित करो, बकाया वेतन दिलाओ। सरकार को पलायन रोकने के लिए स्थानीय रोजगार सृजन पर जोर देना होगा, वरना ये आंसू कभी न थमेंगे।” अली का यह आह्वान न सिर्फ इन 48 मजदूरों के लिए, बल्कि हर उस परिवार के लिए है जो रातों को जागकर प्रतीक्षा करता है।फंसे मजदूरों की सूची: इन चेहरों के नाम पर चोट!ये वे बहादुर हैं, जिनकी मेहनत ने घरों को रोशन किया, आज वे खुद अंधेरे में हैं।इन नामों के पीछे छिपी हैं अनगिनत कहानियां – पत्नी की प्रतीक्षा, बच्चों की पढ़ाई, मां की दुआएं। क्या सरकार इनकी पुकार सुनेगी? क्या ये मजदूर फिर कभी अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू में सांस लेंगे? समय आ गया है, जागो झारखंड! इन बहादुरों को लौटाओ, वरना यह दर्द पूरे परिवार को निगल जाएगा।

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