सरिया: गिरिडीह
11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले (तब बिहार, अब झारखंड) के नेमरा गांव में एक साधारण आदिवासी परिवार में जन्मे शिबू सोरेन, जिन्हें “दिशोम गुरु” के नाम से जाना जाता है, की जिंदगी एक प्रेरणादायक संघर्ष गाथा है। उनके पिता सोबरन मांझी, एक शिक्षक और गांधीवादी विचारों के व्यक्ति थे, जो महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ आदिवासियों के हक की आवाज उठाते थे। लेकिन 27 नवंबर 1957 को, जब शिबू मात्र 15 साल के थे, उनके पिता की हत्या ने उनके जीवन का रुख बदल दिया। यह घटना उनके लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हुई। पढ़ाई छोड़कर शिबू ने आदिवासी समाज के उत्थान और शोषण के खिलाफ लड़ाई का बीड़ा उठाया।
शिबू सोरेन की प्रारंभिक शिक्षा नेमरा के सरकारी स्कूल और गोला हाई स्कूल में हुई। बाद में उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय (तब बिहार, अब तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय) से इंटरमीडिएट और स्नातक की पढ़ाई पूरी की। लेकिन पिता की हत्या के बाद उनका ध्यान पूरी तरह सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन की ओर मुड़ गया। 1970 के दशक में उन्होंने “धनकटनी आंदोलन” शुरू किया, जिसका मकसद आदिवासियों की जमीन और आजीविका को महाजनों के चंगुल से बचाना था। इस आंदोलन ने उन्हें आदिवासी समुदाय का नायक बना दिया।
1972 में शिबू सोरेन ने बिनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। उनका लक्ष्य था आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा और झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाना। इस आंदोलन ने उन्हें “दिशोम गुरु” की उपाधि दी, जिसका अर्थ है “राह दिखाने वाला”। उनके नेतृत्व में JMM ने न केवल सामाजिक जागरूकता फैलाई, बल्कि 2000 में झारखंड को बिहार से अलग कर एक स्वतंत्र राज्य बनाने में भी अहम भूमिका निभाई।
शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर भी उतार-चढ़ावों से भरा रहा। वे 11 बार सांसद चुने गए, जिसमें दुमका लोकसभा सीट से 1980 से 2019 तक कई बार प्रतिनिधित्व किया। वे दो बार राज्यसभा सांसद भी रहे। 2005, 2008 और 2009 में वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, हालांकि हर बार परिस्थितियों ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया। 2004 में वे मनमोहन सिंह की सरकार में कोयला मंत्री बने, लेकिन 1975 के चिरूडीह कांड और 1994 में उनके निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के मामले में कानूनी विवादों के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इन विवादों के बावजूद, वे जनता के बीच लोकप्रिय बने रहे।
शिबू सोरेन ने अपने जीवन में कई बार जंगल में रातें गुजारीं, पुलिस से बचते हुए पारसनाथ की पहाड़ियों और टुंडी के जंगलों में आदिवासियों को संगठित किया। सामूहिक खेती, पशुपालन और रात्रि पाठशालाओं के जरिए उन्होंने आदिवासी समुदाय को शिक्षित और सशक्त बनाने का प्रयास किया। उनकी समानांतर सरकार टुंडी क्षेत्र में इतनी प्रभावशाली थी कि लोग उन्हें “बाबा” और “गुरुजी” कहकर सम्मान देते थे।
4 अगस्त 2025 को, 81 वर्ष की आयु में, लंबी बीमारी (किडनी रोग और स्ट्रोक) के बाद दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में शिबू सोरेन ने अंतिम सांस ली। उनके निधन से झारखंड और देश ने एक ऐसा नेता खो दिया, जिसने आदिवासी अस्मिता को राष्ट्रीय पहचान दी। उनके बेटे और झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया है। शिबू सोरेन की जीवनी न केवल एक व्यक्ति की कहानी है, बल्कि यह झारखंड के संघर्ष, आदिवासी चेतना और सामाजिक न्याय की लड़ाई का दस्तावेज है।